रविवार, 11 सितंबर 2011

शीला दीक्षित

शीला दीक्षित

दिल्ली की मुख्यमंत्री

निर्वाचन क्षेत्र गोल मार्किट, नई दिल्ली

जन्म साँचा:
जन्मतिथि एवं आयु 31 March 1938 (age 73)
राजनैतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
जीवन संगी श्री विनोद दीक्षित, भारतीय प्रशासनिक अधिकारी
संतान 2
आवास दिल्ली
वेबसाइट cmdelhi@nic.in


श्रीमती शीला दीक्षित, भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य की मुख्य मंत्री हैं। इनको 17 दिसंबर,2008 में लगातार तीसरी बार दिल्ली विधान सभा के लिये चुना गया था। यह दिल्ली की दूसरी महिला मुख्य मंत्री हैं। इनका चुनाव-क्षेत्र नयी दिल्ली है परिसीमन गतिविधि से पहले इनका चुनाव-क्षेत्र गोल मार्केट था जो अब समाप्त कर दिया गया है। २००८ मे हुये विधान सभा चुनावों मे शीला दीक्षित के नेतृत्व मे कांग्रेस ने ७० मे से ४३ सीटें जीतीं हैं


अनुभव
इन्हें राजनीति में प्रशासन व संसदीय कार्यों का अच्छा अनुभव है। इन्होंने केन्द्रीय सरकार में १९८६ से १९८९ तक मंत्री पद भी ग्रहण किया था। पहले ये, संसदीय कार्यों की राज्य मंत्री रहीं, तथा बाद में, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री रहीं। १९८४ - ८९ में इन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। संसद सदस्य के कार्यकाल में, इन्होंने लोक सभा की एस्टीमेट्स समिति के साथ कार्य किया। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता की चालीसवीं वर्षगांठ की कार्यान्वयन समिति की अध्यक्षता भी की थी। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष के पद पर, १९९८ में कांग्रेस को दिल्ली में,अभूतपूर्व विजय दिलायी।


जीवन
श्रीमती शीला दीक्षित का जन्म ३१ मार्च,१९३८ को हुआ था। इन्होंने अपनी शिक्षा दिल्ली के कान्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल से ली। बाद में स्नातक और कला स्नातकोत्तर की शिक्षा मिरांडा हाउस कालिज से ली। इनका विवाह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा पूर्व राज्यपाल व केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रहे, श्री उमा शंकर दीक्षित के परिवार में हुआ। इनके पति स्व. श्री विनोद दीक्षित भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य रहे थे। इनके दो संतानें हैं, एक पुत्र व एक पुत्री।

योगदान

शीला दीक्षित विवेकानंद स्लम कालोनी,दिल्ली में भाषण देते हुए
इन्होंने महिला उत्थन के लिये अथक प्रयास किये हैं। इनका महिलाओं को समाज में बराबरी का स्तर दिलाने के अभियानों में अच्छा नेतृत्व रहा है। इन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला स्तर समिति में भारत का प्रतिनिधित्व भी पांच वर्षों(1984 - 89) तक किया। इन्होंने उत्तर प्रदेश में अपने 82 सातियों के साथ अगस्त 1990 में 23 दिनों की जेल यात्रा की थी, जब वे महिलाओं पर समाज के अत्याचारों के विरोध में उठ खडी हुईं तीं, व प्रदर्शन भी किये थे। इससे भड़के हुए लाखों राज्य के नागरिक इस अभियान से जुड़े, व जेलें भरीं। 1970 में, वे यंग विमन्स असेसियेशन की अद्यक्षा भी रहीं, जिसके दौरान, इन्होंने दिल्ली में दो बड़े महिला छात्रावास खुलवाये। यह इंदिरा गाँधी स्मारक ट्रस्ट की सचिव भी हैं। इस ट्रस्ट ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बनाया है। यही ट्रस्ट शांति, निशस्त्रीकरण एवं विकस के लिये इंदिरा गाँधी पुरस्कार देता है, व विश्वव्यापी विषयों पर सम्मेलन आयोजित करता है। इनके संरक्षण में ही, इस ट्रस्ट ने एक पर्यावरण केन्द्र भी खोला है।

रुचि
श्रीमती दीक्षित, हस्तकला व ग्रामीण कलाकारों व कारीगरों के उत्थान में विशेष रुचि लेतीं हैं। ग्रामीण रंगशाला व नाट्यशालाओं का विकास, इनका विशेष कार्य रहा है। 1978 से 1984 के बीच, कपड़ा निर्यातकर्ता संघ (गार्मेंट्स एक्स्पोर्टर्स एसोसियेशन) के कार्यपालक सचिव पद पर, इन्होंने तैयार कपड़ा निर्यात को एक ऊंचे स्तर पर पहुंचाया है। ये धर्म-निर्पेक्षता पर सदा अडिग रहीं हैं। सदा ही सांप्रदायिक ताकतों का प्रत्येक स्तर से विरोध किया है। इनका मानना है, कि भारत में यदि जनतंत्र को जीवित रखना है, सही व्यवहार व सत्यता के मानदंडों का पालन करना जीवन का एक अभिन्न अंग होना चाहिये।

धारित विभाग
प्रशासनिक सुधार
• सामान्य प्रशासन विभाग
• गृह विभाग
• विधि, न्याय एवं संसदीय कार्य
• जन संबंध
• सेवा विभाग
• सतर्कता विभाग
• जल
• उच्च शिक्षा
• प्रशिक्षण एवं तकनीकी शिक्षा
• कला एवं संस्कृति
• पर्यावरण, वन एवं वन्य जीवन विभाग
• सभी अन्य विभाग, जो किसी अन्य को निर्धारित नहीं हैं

निर्वाचन क्षेत्र गोल मार्किट
सम्पर्क
कार्यालय : 23392020, 23392030
आवास. : 23018998, 23018726
ई-मेल पता cmdelhi@nic.in
कैम्प कार्यालय /आवास ३, मोतीलाल नेहरु प्लेस, नई दिल्ली
जनता का समय 9 से 10 बजे प्रातः, दैनिक


दिल्ली के मुख्य मंत्री
• दिल्ली
• भारत के राज्यों के मुख्य मंत्री
# नाम पदभार धारण पदभार च्युत पार्टी
1 चौधरी ब्रह्म प्रकाश 1952 1955 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
2 जी एन सिंह 1955 1956 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
दिल्ली केन्द्र शासित प्रदेश बना
3 मदन लाल खुराना 1993 1996 भारतीय जनता पार्टी
हवाला काण्ड के कारण मध्यावधि में त्यागपत्र
4 साहिब सिंह वर्मा 1996 1997 भारतीय जनता पार्टी
प्याज के बढ़ते दाम के चलते हटाए गए
5 सुषमा स्वराज 1997 1998 भारतीय जनता पार्टी
6 शीला दीक्षित 1998 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस


भारत की सबसे लंबी पदासीन महिला मुख्यमंत्री बनीं


कार्यकाल
१८ दिसंबर, २००९ – जारी
पूर्व अधिकारी लाल कृष्ण आडवाणी



विधायक [[हरियाणा विधान सभा]]

कार्यकाल
१९७७ – १९८२
________________________________________

श्रम एवं रोजगार मंत्री केन्द्रीय मंत्रीमंडल

कार्यकाल
१९७७ – १९७९
________________________________________
शिक्षा मंत्री केन्द्रीय मंत्रीमंडल

कार्यकाल
१९८७ – १९९०
________________________________________
सदस्य राज्य सभा

कार्यकाल
१९९० – १९९३
________________________________________
सूचना एवं प्रसारण मंत्री केन्द्रीय मंत्रीमंडल

कार्यकाल
१९९६,१९९७ – २०००-२००३
________________________________________
जन्म १४ फरवरी, १९५२
अंबाला छावनी, हरियाणा

राष्ट्रीयता भारतीय

राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी

जीवन संगी स्वराज कौशल

संतान १ बेटी
विद्या अर्जन कला स्नातक

पेशा राजनीति
धर्म हिन्दू

सुषमा स्वराज (जन्म : १४ फरवरी १९५२) भारत की भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में विपक्ष की नेता चुनी गई हैं। सम्प्रति वे भारत की पन्द्रहवीं लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेत्री हैं। इसके पहले वे केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में रह चुकी हैं तथा दिल्ली की मुख्यमंत्री भी रही हैं। वे सन २००९ के लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा के १९ सदस्यीय चुनाव-प्रचार-समिति की अध्यक्ष भी रहीं थी। अम्बाला छावनी में में जन्मी सुषमा स्वराज ने एस.डी. कालेज अंबाला छावनी से बीए की डिग्री ली। पढ़ाई समाप्त होने के बाद जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में साथ लगने वाली सुषमा ने राजनीति के मैदान में पूरी तरह से कूद जाने का फैसला कर लिया और आपातकाल का पुरजोर विरोध किया। वे सक्रिय राजनीति से जुड़ीं और सुख-दुख सभी तरह के मोड़ देखे।
राजनीतिक करियर
आपातकाल के बाद उन्होंने दो बार हरियाणा विधानसभा का चुनाव जीता और चौधरी देवी लाल की सरकार में से १९७७ से ७९ के बीच राज्य की श्रम मंत्री रह कर २५ साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बनने का रिकार्ड बनाया था।[1] १९७० में उन्हें एस.डी. कालेज में सर्वश्रेष्ठ छात्रा के सम्मान से सम्मानित किया गया था। वे तीन साल तक लगातार एस.डी. कालेज छावनी की एनसीसी की सर्वश्रेष्ठ कैडेट और तीन साल तक राज्य की श्रेष्ठ वक्ता भी चुनी गईं। पंजाब विश्वविद्यालय द्वारा १९७३ में उन्हें सर्वोच्च वक्ता का सम्मान भी मिला। भाजपा में राष्ट्रीय मंत्री बनने वाली पहली महिला सुषमा के नाम पर कईं रिकार्ड बने हैं। १३ जुलाई, १९७५ को स्वराज कौशल के साथ उनका विवाह हुआ था।[2] वे भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता बनने वाली पहली महिला हैं, वे केबिनेट मंत्री बनने वाली भी भाजपा की पहली महिला हैं, वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं और भारत की संसद में सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार पाने वाली पहली महिला भी वे ही हैं। [3]
वर्तमान
वर्तमान में वे मध्य प्रदेश की विदिशा सीट से लोकसभा की सदस्या चुनी गई हैं। वे विदेशी मामलों में संसदीय स्थायी समिति की अध्यक्षा भी हैं। १९५७ में उनका विवाह स्वराज कौशल के साथ में हुआ था। जो छह साल तक राज्यसभा में सांसद रहे साथ ही मिजोरम में राज्यपाल भी रहे। स्वराज कौशल अभी तक सबसे कम आयु में राज्यपाल का पद प्राप्त करने वाले व्यक्ति हैं। सुषमा स्वराज और उनके पति की उपलब्धियों के ये रिकार्ड लिमका बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज करते हुए उन्हें विशेष दंपत्ति का स्थान दिया गया है। स्वराज दंपत्ति की एक पुत्री है, जो वकालत कर रही हैं। हरियाणा सरकार में श्रम व रोजगार मंत्री रहने वाली सुषमा छावनी से विधायक बनने के बाद में लगातार आगे ही बढ़ती गईं और बाद में दिल्ली पहुँचकर उन्होंने दिल्ली की राजनीति में ही सक्रिय रहने का संकल्प लिया था।

गाँधी का उन्मुक्त या नाटकीय सेक्स जीवन

डा ० पुरुषोत्तम मीणा
भारत पर जबरन थोपे गये राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचन्द गाँधी के जीवन पर इंगलैण्ड के सुप्रसिद्ध इतिहासकार जेड ऐडम्स ने अपने पंद्रह वर्ष के लम्बे अध्ययन और गहन शोधों के आधार पर 288 पृष्ठ की एक किताब लिखी है। जिसे “Gandhi : Naked Ambition” नाम दिया गया है। जिसका हिन्दी अनुवाद किया जाये तो इसे-”गाँधी की नग्न महत्वाकांक्षा” नाम दिया जा सकता है। इस किताब को आधार बनाकर अनेक भारतीय लेखकों ने भी गाँधी पर लिखने का साहस किया है, बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि उक्त किताब के बहाने गाँधी के यौन जीवन पर उंगली उठाने का साहस जुटाया है। गाँधी को यौन कुण्ठाओं से ग्रस्त बताने वाले उक्त लेखक की पुस्तक की आड में अनेक भारतीय लेखक स्वयं भी अपनी अनेकों प्रकार की दमित कुण्ठाओं को बाहर निकालने का प्रयास कर रहे हैं। मैं भी इनमें से एक हूँ और उक्त पुस्तक के बहाने मैं भी गाँधी पर थोडा खुलकर लिखने का खतरा उठा रहा हूँ। आशा करता हूँ कि सुधिपाठक बिना पूर्वाग्रह अपनी अभिव्यक्तियाँ देंगे।
उक्त पुस्तक में गाँधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोगों और इन प्रयोगों में शामिल स्त्रियों के संक्षिप्त उद्गारों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि गाँधी ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के नाम पर 16 वर्ष की कमसिन लडकियों, युवतियों तथा अधेड भारतीय तथा विदेशी महिलाओं के साथ अन्तरंगता से संलिप्त थे। गाँधी स्वयं निर्वस्त्र होकर, इन स्त्रियों को नंगी होकर अपने साथ सोने एवं बन्द बाथरूम में अपने साथ नहाने को सहमत या विवश किया करते थे। गाँधी के आश्रम के कुछ लोगों ने इन गतिविधियों पर दबी जुबान में आपत्ति भी की थी, जिन्हें गाँधी एवं गाँधी के अनुयाईयों की असप्रसन्नता का शिकार होना पडा। यहाँ तक की गाँधी के समय के अनेक वरिष्ठ स्वतन्त्रता सैनानियों ने इसी कारण गाँधी से दूरियाँ बना ली थी और वे यदाकदा ही उनसे बहुत जरूरी होने पर, सार्वजनिक बैठकों या कार्यक्रमों में औपचारिक रूप से मिला करते थे। जिनमें सरदार वल्लभ भाई पटेल भी शामिल थे। मेरे पास जितनी जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार इस किताब में ऐसा काफी मसाला है, जिसे आज की जिज्ञासु युवा पीढी आठ सौ रुपये में खरीदकर पढना चाहेगी!
यद्यपि गाँधी के यौन जीवन पर उंगली उठाना आज के समय में उतना खतरनाक नहीं रहा है, जितना कि तीस वर्ष पहले हो सकता था। भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के उदय के साथ-साथ गाँधी और काँग्रेस के बारे में बहुत कुछ आम जनता को ज्ञात हो चुका है। अतः वर्तमान में गाँधी पर लिखने में उतना खतरा नहीं है, बल्कि गाँधी पर लिखने में प्रचारित होने और माल कमाने का पूरा अवसर है। उक्त किताब के लेखक ने भी यही किया है। मात्र 288 पृष्ठ की पुस्तक की कीमत आठ सौ (800) रुपये देखकर कोई भी समझ सकता है कि किताब को लिखने के पीछे कमाई करना ही बडा लक्ष्य है।
मेरा मानना है कि आज की युवा और पौढ पीढी बहुत संजीदा, जागरूक है और सच्चाई को जानने को उत्सुक है। इस देश में गाँधी को बेनकाब करने वालों को जानने के साथ-साथ और गाँधी को बेनकाब होते हुए देखने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। इसलिये किताब भी बिकेगी और वर्ड की बेस्ट सेलर बुक्स में भी शामिल हो सकती है। इसके बावजूद भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि गाँधी को चाहे कितना ही बेनकाब किया जाये, अभी वह समय नहीं आया है, जबकि गाँधी की मूर्तियों को तोडने के लिये सरकारी आदेश जारी किये जायें। लेकिन एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा, जबकि इस कथित ढोंगी महात्मा का सच इस देश की जनता के साथ-साथ इस देश की सरकार भी स्वीकारेगी! मुझे व्यक्तिगत रूप से गाँधी के “उन्मुक्त या नाटकीय सेक्स जीवन” या “ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के बहाने सेक्स की तृप्ति” को लेकर उतनी आपत्ति नहीं है, जितनी कि गाँधी द्वारा अनेक महिलाओं के सेक्स एवं पारिवारिक जीवन को बर्बाद करने को लेकर है और इससे भी अधिक आपत्तिजनक तो गाँधी को इस देश पर “महात्मा एवं राष्ट्रपिता” के रूप में थोपे जाने पर है।
जहाँ तक गाँधी या नेहरू या अन्य किसी भी ऐसे व्यक्ति के सेक्स जीवन को उजागर करने या सार्वजनिक रूप से उछालने की बात है, जो आज अपना पक्ष रखने के लिये दुनिया में जीवित नहीं है, ऐसा करना न तो नैतिक रूप से उचित है और न हीं कानूनी रूप से ऐसा करना न्यायसंगत! सेक्स किसी भी व्यक्ति के जीवन में नितान्त व्यक्तिगत और महत्वपूर्ण विषय है। जिसे न तो उघाडा जाना चाहिये और न हीं प्रचारित या प्रसारित किया जाना जरूरी है। उक्त पुस्तक के लेखक ने अपने शोध में गाँधी को दमित सेक्स कुण्ठाओं से ग्रस्त पाया है। यदि गुपचुप सेक्स करना कुण्ठाग्रस्त होना नहीं और ब्रह्मचर्य के प्रयोग के नाम पर अपनी मनपसन्द स्त्रियों के साथ यौन सुख पाना कुण्ठाग्रस्त होना है तो लेखक की बात से सहमत होने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिये, लेकिन यह सच नहीं है। क्योंकि यौन विषयों पर हमारे देश में सार्वजनिक रूप से चर्चा करना भी अश्लीलता माना जाता है, लेकिन आज का युवा थोडी हिम्मत दिखाने का प्रयास कर रहा है। परन्तु इस देश का ढाँचा इस प्रकार से बनाया गया है या कालान्तर में ऐसा बन गया है कि सार्वजनिक रूप से समाज अपने ढाँचे से बाहर किसी को निकलने की आजादी नहीं देता। बेशक चोरी-छुपे आप कुछ भी करो।
इस सन्दर्भ में हाल ही में दक्षिण भारतीय फिल्मों की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री खुश्बू के बयान (विवाह पूर्व सुरक्षित सेक्स अनुचित नहीं) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राधा-कृष्ण के बिना विवाह किये साथ रहने को लेकर की गयी टिप्पणी को पढकर अनेक लोगों ने स्वयं को प्रचारित करवाने के लिये या वास्तव में सुप्रीम कोर्ट को सबक सिखाने के लिये हंगाया किया था। म. प्र. हाई कोर्ट में रिट भी दायर की गयी। लेकिन कौन नहीं जानता कि आज या बिगत मानव इतिहास में अपवादों को छोडकर मनचाहा और ताजगीभरा सेक्स पाना, हर उम्र के स्त्री और पुरुष की मनोकामना रही है। हाँ सेक्स के मार्ग में भटकन एवं फिसलन हमेशा रही है। जिसमें कभी न कभी हमारे पूज्यनीय समझे जाने वाले ऋषियों से लेकर आज तक के युवा भटकते रहे हैं।
जहाँ तक मोहनदास कर्मचन्द गाँधी के यौन-जीवन पर सार्वजनिक चर्चा का सवाल है तो हम सब जानते हैं कि गाँधी एक अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी और धर्म का लबादा ओढकर लोगों को मूर्ख बनाने में दक्ष व चालाक किस्म के राजनीतिज्ञ थे। जिसने बडी आसानी से दस्तावेजों पर यह सिद्ध कर दिया कि अंग्रेजों की अदालत द्वारा सुनाई गयी फांसी की सजा से भगत सिंह एवं उसके साथियों को बचाने में उनका (गाँधी का) का भरसक प्रयास रहा, लेकिन इसके बावजूद भी भगत सिंह एवं उनके साथियों को नहीं बचाया जा सका।
जबकि सच्चाई सभी जानते हैं कि गाँधी के कारण ही आजाद भारत को भगत सिंह एवं सुभाष चन्द्र बोस जैसे सच्चे सपूतों की सेवाएँ नहीं मिल पायी। गाँधी को भगत सिंह एवं सुभाष चन्द्र बोस तथा इनके सहयोगी फूटी आँख नहीं सुहाते थे। ऐसे व्यक्तित्व के धनी मोहनदास कर्मचन्द के बारे में उक्त किताब लिखी गयी है। जिसके बारे में बहुत सारे लोग जानते हैं कि गाँधी कभी भी अपनी पत्नी के साथ यौन सम्बन्धों से सन्तुष्ट नहीं थे (अधिकतर भारतीयों की भी यही दशा है), इसलिये उसने एक ऐसा बुद्धिमतापूर्ण, किन्तु चालाकी भरा रास्ता खोज निकाला, जिस पर गाँधी के तत्कालीन समकक्षों में भी दबी जुबान तक में विरोध में आवाज उठाने की हिम्मत नहीं थी और जीवन पर्यन्त गाँधी ऐसा ही ढोंगी बना रहा।
आजादी के बाद भी गाँधी को ढोंगी कहने की हिम्मत जुटाने के बजाय, हमने स्वयं को ही ढोंगी बना लिया और गाँधी को इस देश के “राष्ट्रपिता” के रूप में थोप लिया। वैसे देखा जाये तो ठीक ही किया, क्योंकि इस देश के राष्ट्रपिता स्वामी विवेकानन्द या स्वामी दयानन्द सरस्वती तो हो नहीं सकते थे! क्योंकि जिस देश की संस्कृति ऋषियों की अवैध औलाद (वेदव्यास) की अवैध सन्तानों से (नियोग के बहाने) संचारित होकर महाभारत की गाथा को आज तक गर्व के साथ गाती और फिल्माती हो, उस देश की आधुनिक सन्तानों का सच्चा राष्ट्रपिता यौनेच्छाओं की खुलकर तृप्ति करने वाला मोहनदास कर्मचन्द गाँधी ही हो सकता था।
अन्त में उपरोक्त के अलावा तीन बातें और कहना चाहूँगा-
1. पहली गाँधी दमित सेक्स या यौन कुण्ठाओं से ग्रस्त नहीं था, बल्कि वह अन्त समय तक खुलकर यौनसुख भोगने वाला ऐसा नाटककार और मुखौटे पहने जीवन जीने वाला भोगी था, जिसने जीवनभर स्वयं की पत्नी या अपने परिवार की तनिक भी परवाह नहीं की और जिसने अपनी राजनैतिक इच्छा पूर्ति के लिये केवल इस राष्ट्र के टुकडे होना ही स्वीकार किया, बल्कि कूटनीतिक तरीके से ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित कर दी कि भारत के टुकडे होकर ही रहें।
2. दूसरी बात जिसे बहुत कम लोग जानते हैं कि गाँधी केवल अंग्रेज सरकार एवं अंग्रेजी प्रशासन के अन्याय या मनमानियों के विरुद्ध ही अनशन (उपवास) नहीं करता था, बल्कि उसने इस देश के 70 प्रतिशत दबे-कुचले और दमित लोगों के मूलभूत और जीवन जीने के लिये जरूरी हकों को छीनने के लिये भी अनशन का सफल नाटक किया। जिसके दुष्परिणाम इस देश को सदियों तक भुगतने पडेंगे। गाँधी के इसी षडयन्त्र की अवैध सन्तान है-अजा, अजजा एवं अन्य पिछडा वर्ग को नौकरियों में एवं अजा व अजजा को विधायिका में लुंजपुंज और कभी न खत्म होने वाला आरक्षण।
3. अन्तिम और तीसरी बात-जहाँ तक भारत के इतिहास और वर्तमान को देख कर ईमानदारी से आकलन करने की बात है तो गाँधी से भी अधिक कामुक और यौन लालायित हर आम स्त्री-पुरुष होता है, लेकिन स्त्री को तो हमने अनेक प्रकार की बेडियों में जकड रखा है, जबकि आम साहसी पुरुष यौनसुख हेतु मिलने वाले अवसरों को भुनाने से कभी नहीं चूकता। चूँकि गाँधी, नेहरू, बिल क्लिण्टन या कृष्ण ऐसे बडे व्यक्तित्व हैं, जिनके निजी जीवन की अन्तरंग बातें भी गोपनीय नहीं रह पाती हैं। इसीलिये इन पर किताबें लिखी जायेंगी, बहसें होंगी, अदालतों में याचिकाएँ दायर होंगी और कुछ लोग सडकों पर आकर भी धमाल मचा सकते हैं, लेकिन इसमें कुछ भी अस्वाभाविक या अनहोनी बात नहीं है। यह सब प्राकृतिक है। किसी भी जीव का अध्ययन करके देखा जा सकता है-अनेक मादाओं के झुण्ड में कोई एक शेर, एक बन्दर, एक सियार, एक चीता, एक सांड, एक भैंसा, एक बकरा या एक कुत्ता पाया जाता है और सन्तति का क्रम बिना व्यवधान चलता रहता है। यह अलग बात है कि आधुनिक नारी भी पुरुष की ही भांति प्रत्येक यौन-संसर्ग के दौरान यौनचर्मोत्कर्स की उत्कट लालसा की अवास्तविक और असम्भव कल्पनाओं में विचरण करने लगी है। दुष्परिणामस्वरूप ऐसी राह भटकी महिलाओं में से लाखों को हिस्टीरया जैसी अनेक मानसिक बीमारियों से पीडित होकर, घुट-घुट कर मरते हुए देखा जा सकता है।
लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? इस सवाल पर विस्तार से लिखने की जरूरत है, लेकिन संक्षेप में इतना ही लिखना चाहूँगा कि सेक्स दो टांगों के बीच का खेल नहीं(जैसा कि समझा जाता है) , बल्कि यह स्वस्थ मनुष्य के दो कानों के बीच (दिमांग) का खेल है। यदि और भी सरलता से कहा जाये तो शारीरक रूप से पूरी तरह स्वस्थ स्त्री-पुरुष के बीच सेक्स 20 प्रतिशत शारीरिक और 80 प्रतिशत मानसिक होने पर ही सुख या चर्मोत्कर्स या चर्मबिन्दु पर पहुँचने का आनन्द लिया जा सकता है। अन्यथा तो सेक्स पुरुषों की क्षणिक कामाग्नि के उबाल को शान्त करने का साधन और स्त्रियों की कामाग्नि प्रज्वलित करने वाली एक आवश्यक बुराई के सिवा कुछ भी नहीं है।

अल्लाह

अल्लाह
अल्लाह (अरबी : अल्लाह्, الله) अरबी भाषा में ईश्वर के लिये शब्द है । ज़्यादातर इसे मुसलमान अपने एकमात्र परमेश्वर के लिये प्रयुक्त करते हैं । उर्दू और फ़ारसी में अल्लाह को ख़ुदा भी कहा जाता है ।

व्युत्पत्ति
मुसलमान मानते हैं कि अल्लाह शब्द का अर्थ होता है "द गॉड", यानि कि "ईश्वर" । इस शब्द का कोई लिंग नहीं होता न ही कोई बहुवचन ।

मान्यता
इस्लाम में मान्यता है कि अल्लाह अदृश्य पराशक्ति है । उसका कोई रूप (मानव-समान या कोई अन्य) नहीं, कोई रंग, अंग, लिंग (पुरुष या स्त्री), मान, इत्यादि नहीं । उसका कोई पिता-माता या पुत्र-पुत्री नहीं । उसकी मूर्ति या चित्र बनाने पर सख़्त मनाही है । सिर्फ़ वही पूजा योग्य है । वो सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वव्यापक है । क़ुरान में अल्लाह के और कई नाम भी दिये गये हैं । अल्लाह की ख़िदमत में कई फ़रिश्ते भी हैं । उसीने मुहम्मद को क़ुरान सुनवाया ।
Bismillah al-Rahman al-Rahim
Following is a list of Allah's Beautiful Names and Attributes.

1. ALLAH
Ism al-Dhat al-Qudsiyya = The Name of the Divine Essence
Ism al-Jalala = The Sublime Name
al-Ism al-A'zam = The Most Magnificent Name

2. Al-Rahman
The All-Beneficent

3. Al-Rahim
The Most Merciful

4. Al-Malik
The King, The Sovereign

5. Al-Quddus
The Most Holy

6. Al-Salam
Peace and Blessing

7. Al-Mu'min
The Guarantor

8. Al-Muhaymin
The Guardian, the Preserver

9. Al-'Aziz
The Almighty, the Self-Sufficient

10. Al-Jabbar
The Powerful, the Irresistible

11. Al-Mutakabbir
The Tremendous

12. Al-Khaliq
The Creator

13. Al-Bari'
The Maker

14. Al-Musawwir
The Fashioner of Forms

15. Al-Ghaffar
The Ever-Forgiving

16. Al-Qahhar
The All-Compelling Subduer

17. Al-Wahhab
The Bestower

18. Al-Razzaq
The Ever-Providing

19. Al-Fattah
The Opener, the Victory-Giver

20. Al-Alim
The All-Knowing, the Omniscient

21. Al-Qabid
The Restrainer, the Straitener

22. Al-Basit
The Expander, the Munificent

23. Al-Khafid
The Abaser

24. Al-Rafi'
The Exalter

25. Al-Mu'izz
The Giver of Honor

26. Al-Mudhill
The Giver of Dishonor

27. Al-Sami'
The All-Hearing

28. Al-Basir
The All-Seeing

29. Al-Hakam
The Judge, the Arbitrator

30. Al-'Adl
The Utterly Just

31. Al-Latif
The Subtly Kind

32. Al-Khabir
The All-Aware

33. Al-Halim
The Forbearing, the Indulgent

34. Al-'Azim
The Magnificent, the Infinite

35. Al-Ghafur
The All-Forgiving

36. Al-Shakur
The Grateful

37. Al-'Ali
The Sublimely Exalted

38. Al-Kabir
The Great

39. Al-Hafiz
The Preserver

40. Al-Muqit
The Nourisher

41. Al-Hasib
The Reckoner

42. Al-Jalil
The Majestic

43. Al-Karim
The Bountiful, the Generous

44. Al-Raqib
The Watchful

45. Al-Mujib
The Responsive, the Answerer

46. Al-Wasi'
The Vast, the All-Encompassing

47. Al-Hakim
The Wise

48. Al-Wadud
The Loving, the Kind One

49. Al-Majid
The All-Glorious

50. Al-Ba'ith
The Raiser of the Dead

51. Al-Shahid
The Witness

52. Al-Haqq
The Truth, the Real

53. Al-Wakil
The Trustee, the Dependable

54. Al-Qawiyy
The Strong

55. Al-Matin
The Firm, the Steadfast

56. Al-Wali
The Protecting Friend, Patron, and Helper

57. Al-Hamid
The All-Praiseworthy

58. Al-Muhsi
The Accounter, the Numberer of All

59. Al-Mubdi'
The Producer, Originator, and Initiator of all

60. Al-Mu'id
The Reinstater Who Brings Back All

61. Al-Muhyi
The Giver of Life

62. Al-Mumit
The Bringer of Death, the Destroyer

63. Al-Hayy
The Ever-Living

64. Al-Qayyum
The Self-Subsisting Sustainer of All

65. Al-Wajid
The Perceiver, the Finder, the Unfailing

66. Al-Majid
The Illustrious, the Magnificent

67. Al-Wahid
The One, the All-Inclusive, the Indivisible

68. Al-Samad
The Self-Sufficient, the Impregnable, the Eternally Besought of All, the Everlasting

69. Al-Qadir
The All-Able

70. Al-Muqtadir
The All-Determiner, the Dominant

71. Al-Muqaddim
The Expediter, He who brings forward

72. Al-Mu'akhkhir
The Delayer, He who puts far away

73. Al-Awwal
The First

74. Al-Akhir
The Last

75. Al-Zahir
The Manifest; the All-Victorious

76. Al-Batin
The Hidden; the All-Encompassing

77. Al-Wali
The Patron

78. Al-Muta'al
The Self-Exalted

79. Al-Barr
The Most Kind and Righteous

80. Al-Tawwab
The Ever-Returning, Ever-Relenting

81. Al-'Afuww
The Pardoner, the Effacer of Sins

82. Al-Muntaqim
The Avenger

83. Al-Ra'uf
The Compassionate, the All-Pitying

84. Malik al-Mulk
The Owner of All Sovereignty

85. Dhu al-Jalal wa al-Ikram
The Lord of Majesty and Generosity

86. Al-Muqsit
The Equitable, the Requiter

87. Al-Jami'
The Gatherer, the Unifier

88. Al-Ghani
The All-Rich, the Independent

89. Al-Mughni
The Enricher, the Emancipator

90. Al-Mu'ti
The Giver

91. Al-Mani'
The Withholder, the Shielder, the Defender

92. Al-Nafi'
The Propitious, the Benefactor

93. Al-Darr
The Distresser, the Harmer

94. Al-Nur
The Light

95. Al-Hadi
The Guide

96. Al-Badi'
The Incomparable, the Originator

97. Al-Baqi
The Ever-Enduring and Immutable

98. Al-Warith
The Heir, the Inheritor of All

99. Al-Rashid
The Guide, Infallible Teacher, and Knower

100. Al-Sabur
The Patient, the Timeless

Subhan Allah wa bi Hamdihi, Subhan Allah al-`Azim




सूरा अल - बकरा (मदीना में उतरी - आयतें 286)

अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है ।

1. अलिफ0 लाम0 मीम0 ।

2. वह किताब यही है जिसमें कोई सन्देह नहीं, मार्गदर्शन है डर रखने वाले के लिये ।

3. जो अनदेखे ईमान लाते है, नमाज कायम करते है और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से खर्च करते है ।

4. और जो उस पर ईमाल लाते है जो तुमपर उतरा और जो तुमसे पहले अवतरित हुआ है और आखिरत पर वही लोग विश्वास रखते है ।

5. वही लोग है जो अपने रब के सीधे मार्ग पर है और वही सफलता प्राप्त करने वाले है ।

6. जिन लोगों ने कुफ्र (इनकार) किया उनके लिए बराबर है, चाहे तुमने उन्हे सचेत किया हो या सचेत न कया हो, वे ईमान नहीं लाएँगे ।

7. अलालाह ने उनके दिलों पर और उनके कानों पर मुहर लगा दी है उनकी आँखों पर परदा पड़ा है, और उनके लिये बड़ी यातना है ।

8. कुछ लोग ऐसे है जो कहते है कि हम अल्लाह और अन्तिम दिन ईमान रखते है, हालाँकि वे ईमान नहीं रखते ।

9. वे अल्लाह और ईमानवालों के साथ धोखेबाजी कर रहे है, हालांकि धोखा वे स्वयं अपने-आप को ही दे रहे है, परन्तु वे इसको महसूस नहीं करते ।

10. उनके दिलों में रोग था तो अल्लाह ने उनके रोग को और बढ़ा दिया और नके झूठ बोलते रहने के काकरण उनके लिये एक दुखद यातना है ।

11. और जब उनसे कहा जाता है कि जमीन में बिगाड़ पैदा न करो, तो कहते है हम तो केवल सुधारक है ।

12. जान लो वही है जो बिगाड़ पैदा करते है, परन्तु उन्हें एहसास नहीं होता ।

13. और जब उनसे कहा जता है, ईमान लाओ जैसे लोग ईमान लाए है, कहते है क्या हम ईमान लाएँ जैसे कम समझ लोग ईमान लाए है । जान लो, वही कम समझ है परन्तु जानते नहीं ।

14. और जब ईमान लालनेवालों से मिलते है तो कहते है हम भी ईमान लाए है और जब एकांत में अपने शैतानों के पास पहुँचे है, तो कहते है हम तो तुम्हारे साथ ह और यह तो हम केवल परिहास कर रहे है ।

15. अल्लाह उनके साथ परिहास कर रहा है और उन्हें उनकी सरकशी में ढील दिए जाता है, वे भटकते फिर रहे है ।

16. यही वे लोग है, जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले में गुमराही मोल ली, किन्तु उनके इस व्यापार ने न कोई लाभ पहुँचाया और न ही वे सीधा मार्ग पा सके ।

17. उनकी मिसाल ऐसी है जैसे किसी व्यक्ति ने आग जलाई, फिर जब उसने उसके वातावरण को प्रकाशित कर दिया, तो अल्लाह ने उनका प्रकाश ही छीन लिया और उन्हें अँधेरों में छोड़ दिया जिससे उन्हें कुछ सुझाई नहीं दे रहा है ।

18. वे बहरे है, गूँगे है, अंधे है, अब वे लौटने के नहीं ।

19. या (उनकी मिसाल ऐसी है) जैसे आकाश से वर्षा हो रही हो जिसके साथ अँधेरे हों और गरज और चमक भी हो, वे बिजली की कड़क के कारण मृत्यु के भय से अपनो कानों में उँगलियाँ दे ले रहे हो - और अल्लाह ने तो इनकार करने वालों को घेर रखा है ।

20. मानो शीघ्र ही बिजली उनकी आँखें की रोशनी उचक लेने को है, ब भी वह उनके सामने चमकती है उसमें वे चल पड़ते है और ज उन पर अँधेरा छा जाता है तो खड़े हो जाते है, अगर अल्लाह चाहता तो उनकी सुनने और उनके देखने की शक्ति बिलकुल ही छीन लेता । निस्संदेह, अल्लाह हर चीज की सामर्थ्य प्राप्त है ।

21. ऐ लोगों बन्दगी करो अपने रब की जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच सको,


22. वही है जिसने तुम्हारे लिए जमीन को फर्श और आकाश को छत बनाया, और आकाश से पानी उतारा, फिर उसके द्रारा हर प्रकार की पैदावार और फल तुम्हारी रोजी के लिए पैदा किए, अतः तुम जब जानते हो तो अल्लाह के समकक्ष क्यों न ठहराओ ।

23. और अगर उसके विषय में जो हमने अपने बन्दे पर उतारा है, तुम किसी सन्देह में हो तो उस जैसी कोई सूरा ले आओ और अल्लाह से हटकर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम्हें विश्वास है, यदि तुम सच्चे हो ।

24. फिर अगर तुम ऐसा न कर सको और तुम कदापि नहीं कर सकते, तो डरो उस आग से जसका ईंधन इनसान और पत्थर है, जो इनकार करने वालों के लिये तैयार की गई है ।

25. जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें शुभ सूचना दे दो कि उनके लिये ऐसे बाग है जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जब भी उनमें से कोई फल उन्हें रोजी के रुप में मिलेगा, तो कहेंगे यह तो वही है जो पहले हमें मिला था, और उन्हें मिलता-जुलता ही (फल) मिलेगा, उनके लिए वहाँ पाक-साफ पत्नियाँ होंगी, और वे सदैव वहाँ रहेंगे ।

26. निस्संदेह अल्लाह नहीं शर्माता कि वह कोई मिसाल पेश करे चाहे वह हो मच्छर की, बल्कि उससे भी बढ़कर किसी तुच्छ चीज की । फिर जो ईमान लाए है वे तो जानते है कि वह उनके रब की ओर से सत्य है, रहे इनकार करने वाले तो वे कहते है इस मिसाल से अल्लाह का अभिप्राय क्या है । इससे वह बहुतो को भटकने देता है और बहुतो को सीधा मार्ग दिखा देता है, मगर इससे वह केवल अवज्ञाकारियों को ही भटकने देता है ।

27. जो अल्लाह की प्रतिज्ञा को उसे सुदृढ़ करने के पश्चात् भंग कर देते है और जिसे अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया है उसे काट डालते है, और जमीन में बिगाड़ पैदा करतेहै, वही है जो घाटे में है ।

28. तुम अल्लाह के साथ अविश्वस की नीति कैसे अपनाते हो, जबकि तुम निर्जीव थे तो उसने तुम्हें जीवित किया, फिर वही तुम्हें मौत देता है, फिर वही तुम्हें जीवित करेगा, फिर उसी की ओर तुम्हें लौटना है ।

29. वही तो है जिसने तुम्हारे लिए जमीन की सारी चीजें पैदा की, फिर आकाश की ओर रुख किया और ठीक तौर पर सात आकाश बनाए और वह हर चीज को जानता है ।

30. और याद करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा कि मैं धरती में (मनुष्य को) खलीफा (सत्ताधारी) बनाने वाला हूँ । उन्होंनें कहा, क्या उसमें उसको रखेगा, जो उसमें बिगाड़ पैदा करे और रक्तपात करे और हम तेरा गुणगान करते र तुझे पवित्र कहते है । उसने कहा मैं जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते ।

31. उसने (अल्लाह ने) आदम को सारे नाम सिखाए, फिर उन्हें फरिश्तों के सामने पेश किया और कहा अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इनके नाम बताओ ।

32. वे बोले, पाक और महिमावान है तू । तूने जो कुछ हमें बताया उसके सिवा हमें कोई ज्ञान नहीं । निसंदेह तू सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है ।

33. उसने कहा, ए आदम । उन्हें उन लोगों के नाम बताओ । फिर जब उसने उन्हें उनके नाम बता दिये तो (अल्लाह ने) कहा, क्या मैंने तुमसे कहा न था कि मैं आकाशें और धरती की छिपी बातों को जानता हूँ और मैं जानता हूं जो कुछ तुम जाहिर करते हो और जो कुछ छिपाते हो ।

34. और याद करो जब हमने फरिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो, उन्होंने सजदा किया सिवाय इबलीस के, उसने इनकार कर दिया और लगा बड़ा बनने और काफिर हो रहा ।

35. और हमने कहा, ए आदम । तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो और वहाँ जी भर बेरोक-टोक जहाँ से तुम दोनों का जी चाहे खाओ, लेकिन इस वृक्ष के पास न जाना, अन्यथा तुम जालिम ठहराओगे ।

36.अन्ततः शैतान ने उन्हें वहाँ से फिसला दिया, फिर उन दोनों को वहाँ से निकलवाकर छोड़, जहाँ वे थे । हमने कहा कि उतरो, तुम एक-दूसरे के शत्रु होगे और तुम्हें एक समय तक धरती में ठहरना और बिलसना है ।

37. फिर आदम ने अपने रब से कुछ शब्द पा लिये, तो अल्लाह ने उसकी तौबा कबूल कर ली, निस्संदेह वही तौबा कबूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है ।

38. हमने कहा, तुम सब यहाँ से उतरो, फिर यदि तुम्हारे पास मेरी ओर से कोई मार्गदर्शन पहुँचे, तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण किया, तो ऐसे लोगों को न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे ।

39. और जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वही आग में पड़नेवाले है, वे उसमें सदैव रहेंगे ।

40. ऐ इसराईल की संतान । याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया था । और मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करो, मैं तुमसे की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करुँगा और हाँ मुझी से डरो ।

41. और ईमान लाओ उस चीज पर जो मैंने उतारी है, जो उसकी पुष्टि में है जो तुम्हारे पास है, और सबसे पहले तुम ही उसके इनकार करने ले न बनो और मेरी आयतों को थोड़ा मूल्य प्राप्त करने का साधन न बनाओ, मुझसे ही तुम डरो ।

42. और सत्य में असत्य का घाल-मेल न करो और जानते-बूझते सत्या को छिपाओ मत ।

43. और नमाज कायम करो और जकात दो और (मेरे समक्ष) झुकने वालों के साथ झुको ।

44. क्या तुम लोगों को तो नेकी और एहसान का उपदेश देते हो और अपने आपको भूल जाते है, हालाँकि तुम किताब भी पढ़ते हो । फिर क्या तुम बुद्वि से काम नहीं लेते ।

45. धैर्य और नमाज से मदद लो, और निस्संदेह यह (नमाज) बहुत कठिन है, किन्तु उन लोगों के लिये नहीं जो डरने वाले है,

46. जो समझते है कि उन्हें अपने रब से मिलना है और उसी की ओर उन्हें पलटकर जाना है ।

47. ऐ इसराईल की संतान । याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया था और इसे भी कि मैंने तुम्हें सारे संसार पर श्रेष्ठता प्रदान की थी ।

48. और डरो उस दिन से जब न कोई किसी की ओर से कुछ तावान भरेगा और न किसी की ओर से कोई सिफारिश ही कबूल की जाएगी और न किसी की ओर से कोई फिदया (अर्थदण्ड) लिया जाएगा और न वे सहायता ही पा सकेंगे ।

49. और याद करो जब हमने तुम्हें फिरऔनियों से छुटकारा दिलाया जो तुम्हें अत्यन्त बुरी यातना देते थे, तुम्हारे बेटों को मार डालते थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रहने देते थे, और इसमें तुम्हारे रब की ओर से बडऱी परीक्षा थी ।

50. याद करो जब हमने तुम्हे सागर में अलग-अलग चौड़े रास्ते से ले जाकर छुटकारा दिया और फिरऔनियों को तुम्हारी आँखों के सामने डुबो दिया ।

51. और तुम याद करो जब हमने मूसा से चलीस रातों का वाद ठहराया तो उसके पीछे तुम बछड़े को अपना देवता बना बैठे, तुम अत्याचारी थे ।

52. फिर इसके बाद भी हमने तुम्हें क्षमा किया, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ ।

53. और याद करो जब मूसा को हमने किताब और कसौट प्रदान की, ताकि तुम मार्ग पा सको ।

54. और याद करो जब मूसा ने अपनी कौम से कहा, ऐ मेरी कौम के लोगो । बछड़े को देवता बनाकर तुमने अपने ऊपरजुल्म किया है, तो तुम अपने पैदा करने वाले की ओर पलटो, अतः अपने लोगों को स्वयं कत्ल करो । यही तुम्हारे पैदा करने वाले की दृष्टि में तुम्हारे लिए अच्छा है, फिर उसने तुम्हारी तौबा कबूल कर ली । निस्संदेह, वह बड़ा तौबा कबूल करने वाला, अत्यन्त दयावान है ।

55. और याद करो जब तुमने कहा था । ऐ मूसा, हम तुम पर ईमान नहीं लाएँगे जब तक अल्लाह को खुल्लम-खुल्ला न देख ले । फिर एक कड़क ने तुम्हें आ दबोचा, तुम देखते रहे ।

56. फिर तुम्हारे निर्जीव हो जाने के पश्चात हमने तुम्हें जिला उठाया, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ ।

57. और हमने तुम पर बादलों की छाया की और तुम पर मन्न और सलवा उतारा - खाओ, जो अच्छी पाक चीजें हमने तुम्हें प्रदान की है । उन्होंने हमारा तो कुछ भी नहीं बिगाड़ा, बल्कि वे अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे ।

58. और जबहमने कहा था, इस बस्ती में प्रवेश करो फिर उसमें से जहाँ से चाहो जी भर खाओ, और बस्ती के द्वार में सजदागुजार बनकर प्रवेश करो, और कहो, छूट है । हम तुम्हारी खताओं को क्षमा कर देंगे और अच्छे से अच्छा काम करने वालों पर हम और अधिक अनुग्रह करेंगे ।

59. फिर जो बात उनसे कही गई थी जालिमों ने उसे दूसरी बात से बदल दिया । अन्ततः जालिमों पर हमने, जो अवज्ञा वे कर रहे थे उसके कारण, आकाश ये यातना उतारी ।

60. और याद करो जब मूसा ने अपनी कौम के लिये पानी की प्रार्थना की तो हमने कहा, चट्टान पर अपनी लाठी मारो, तो उससे बाहर स्त्रोत फूट निकले और हर गिरोह ने अपना-अपना घाट जान लिया - खाओ और पियो अल्लाह का दिया और धरती में बिगाड़ फैलाते मत फिरो ।

61. और याद करो जब तुमने कहा था, ऐ मूसा, हम एक ही प्रकार के खाने पर कदापि संतोष नहीं कर सकते, अतः हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो कि वह हमाे वास्ते धरती की उपज से साग-पात और ककडियाँ और लहसुन और मसूर और प्याज निकाले । कहा (मूसा ने) क्या तुम जो घटिया चीज है उसको उससे बदलकर लेना चाहते हो जो उत्तम है । किसी नगर में उतरो, फिर जो कुछ तुमने माँगा है, तुम्हें मिल जाएगा – र उन पर अपमान और हीन दसा थोप दी गई, और वे अल्लाह के प्रकोप के भागी हुए । यह इलिए कि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते रहे और नबियों की अकारण हत्या करते थे । यह इसलिये कि उन्होंने अवज्ञा की और वे सीमा का उल्लंघन करते रहे ।

62. निस्संदेह, ईमानवाले और जो यहूदी हुए और ईसाई और साबिई जो भी अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया और अच्छा कर्म किया तो ऐसे लोगो का उनके अपने रब के पास (अच्छा) बदला है, उनको न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे ।

63. और याद करो जब हमने इस हाल में कि तूर (पर्वत) को तुम्हारे ऊपर ऊँचा कर रखा था, तुमसे दृढ़ वचन लिया था । जो चीज हमने तुम्हे दी है उसे मजबूती के साथ पकड़ो और जो कुछ उसमें है उसे याद रखो ताकि तुम बच सको ।

64. फिर इसके पश्चात भी तुम फिर गए, तो यदि अल्लाह की कृपा और उसकी दयालुता तुम पर न होती, तो तुम घाटे में पड़ गये होते ।

65. और तुम उन लोगों के विषय में तो जानते ही हो जिन्होंने तुममें से सब्त के दिन के मामले में मर्यादा का उल्लंघन किया था, तो हमने उनसे कह दिया बन्दर हो जाओ, धिक्कारे और फिटकारे हुए ।

66. फिर हमने इसे सामनेवालों और बाद के लोगों के लिये शिक्षा-सामग्री और डर रखने वालों के लिये नसीहत बनाकर छोड़ा ।

67. और याद करो जब मूसा ने अपनी कौम से कहा निश्चय ही अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि एक गाय जबह करो । कहने लगे, क्या तुम हमसे परिहास करते हो । उसने कहा मैं इससे अल्लाह की पनाह माँगता हूँ कि जाहिल बनूँ ।

68. बोले हमारे लिये अपने रब से निवेदन करो कि वह हम पर स्पष्ट कर दे कि वह (गाय) कौन-सी है । उसने कहा वह कहता है कि वह ऐसी गाय है जो न बूढी है, न बछिया, इनके बीच की रास है, तो जो तुम्हें हुक्म दिया जा रहा है, करो ।

69. कहने लगे, हमारे लिये अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि उसका रंग कैसा है । कहा, वह कहता है कि वह गाय सुनहरी है, गहरे चटकीले रंग की कि देखनेवालों को प्रसन्न कर देती है ।

70. बोले, हमारे लिये अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि वह कौन-सी है, गायों का निर्धारण हमारे लिये संदिग्ध हो रहा है । यदि अल्लाह ने चाहा तो हम अवश्य पता लगा लेंगे ।

71. उसने कहा वह कहता है कि वह ऐसी गाय है जो सधाई हुई नहीं है कि भूमि जोतती हो, और न वह खेत को पानी देती है, ठीक-ठाक है, उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट नहीं है । बोले अब तुमने ठीक बात बताई है । फिर उन्होंने उसे जब्ह किया, जबकि वे करना नहीं चाहते है ।

72. और याद करो जब तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी, फिर उस सिलसिले में तुमने टाल-मटोल से काम लिया – जबकि जिसको तुम छिपा रहे थे, अल्लाह उसे खोल देने वाला है ।

73. --------तो हमने कहा उसे उसके एक हिस्से से मारो । इस प्रकार अल्लाह मुर्दों को जीवित करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है, ताकि तुम समझो ।

74. फिर इसके पश्चात भी तुम्हारे दिल कठोर हो गए, तो वे पत्थरों की तरह हो गए बल्कि उनसे भी अधिक कठोर, क्योंकि कुछ पत्थर ऐसे भी होते है जिनसे नहरें फूट निकलती है, और उनमें से कुछ ऐसे भी होते है कि फट जाते है तो उनमें से पानी निकलने लगता है, और उनमें से कुछ ऐसे भी होते है जो अल्लाह के भय से गिर जाते है । और अल्लाह, जो कुछ तुम कर रहे हो, उससे बेखबर नहीं है ।

75. तो क्या तुम इस लालच में हो कि वे तुम्हारी बात मान लेंगे, जबकि उनमें से कुछ लोग अल्लाह का कलाम सुनते रहे है, फिर उसे भली-भाँति समझ लेने के पश्चात जान-बूझकर उसमें परिवर्तन करते रहे ।

76. और जब वे ईमान लाने वालों से मिलते है तो कहते है, हम भी ईमान रखते है, और जब आपस में एक-दूसरे से एकांत में मिलते है तो कहते है क्या तुम उन्हें वे बातें, जो अल्लाह ने तुम पर खोली, बता देते हो कि वे उनके द्वारा तुम्हारे रब के यहाँ हुज्जत में तुम्हारा मुकाबिला करे । तो क्या तुम समझते नहीं ।

77. क्या वे जानते नहीं कि अल्लाह वह सब कुछ करता है, जो कुछ वे छिपाते और जो कुछ जाहिर करते है ।

78. और उनमें सामान्य बेपढे भी है जिन्हें किताब का ज्ञान नहीं है, बस कुछ कामनाओं एवं आशाओं को धर्म जानते है, और वे तो बस अटकल से काम लेते है ।

79. तो विनाश और तबाही है उन लोगों के लिये जो अपने हाथों से किताब लिखते है फिर कहते है यह अल्लाह की ओर से है, ताकि उसके द्घारा थोड़ा मूल्य प्राप्त कर ले । तो तबाही है उनके लिए उसके कारण जो उनके हाथों ने लिखा और तबाही है उनके लिए उसके कारण जो वे कमा रहे है ।

80. वे कहते है जहन्नम की आग हमें नहीं छू सकती, हाँ कुछ गिनेचुने दिनों की बात और है । कहो क्या तुमने अल्लाह से कोई वचन ले रखा है फिर तो अल्ला हकदापि अपने वचन के विरुद्घ नहीं जा सकता । या तुम अल्लाह के जिम्मे डालकर ऐसी बात कहते हो जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं ।

81. क्यों नही, जिसने भी कोई बदी कमाई और उसकी खताकारी ने उसे अपने घेरे में ले लिया, तो ऐसे ही लोग आग (जहन्नम) मेंपड़ने वाले है, वे उसी में ही रहेंगे ।

82. रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किये, वही जनन्तवाले है, वे सदैव उसी में रहेंगे ।

83. और याद करो जब इसराईल की संतान से हमने वचन लिया अल्लाह के अतिरिक्त किसी की बन्दगी न करोगे, और माँ-बाप के साथ और नातेदारों के साथ और अनाथों और मुहताजों के साथ अच्छा व्यवहार करोगे, और यह कि लोग लोगों से भली बात कहो और नमाज कायम करो और जकात दो । तो तुम फिर गये, बस तुममें बचे थोड़े ही, और तुम उपेक्षा की नीति ही अपनाए रहे ।

84. और याद करो जब हमने तुमसे वचन लिया अपने खून न बहाओगे और न अपने लोगों को अपनी बस्तियों से निकालोगे । फिर तुमने इकरार किया और तुम स्वयं इसके गवाह हो ।

85. फिर तुम वही हो कि अपने लोगों की हत्या करते हो और अपने ही एक गिरोह के लोगों को उनकी बस्तियों से निकालते हो, तुम गुनाह और ज्यादती के साथ उनके विरुद्घ एक-दूसरे के पृष्ठपोषक बन जाते है, और यदि वे बन्दी बनकर तुम्हारे पास आते है , तो उनकी रिहाई के लिये फिदए (अर्थदण्ढ) का लेन-देन करते हो जबकि उनके उनके घरों से निकालना ही तुम पर हराम है । तो क्या तुम किताब के एक हिस्से को मानते हो और एक को नहीं मानते । फिर तुममे जो सा करे उनका बदला इसके सिवा और क्या हो सकता है कि सांसारिक जीवन में अपमान हो । और कियामत के दिन से लोगों को कठोर से कठोर यातना की ओर फेर दिया जाएगा । अल्लाह उससे बेखबर नहीं है जो कुछ तुम कर रहे हो ।

86. यही वे लोग है जो आखिरत के बदले सांसारिक जीवन के खरीदार हुए, तो न उनकी यातना हल्की की जाएगी और न उन्हें को ई सहायता पहुँच सकेगी ।

87. और हमने मूसा को किताब दी थी, और उसके पश्चात आगे पीछे निरन्तर रसूल भेजते रहे, और मरयमम के बेटे ईसा को खुली खुली निशानियाँ प्रदान की और पवित्र आत्मा के द्घारा उसे शक्ति प्रदान की, तो यही तो हुआ कि जब भी कोई रसूल तुम्हारे पास वह कुछ लेकर आया जो तुम्हे जी को पसंद न था, तो तुमअकड़ बैठे, तो एक गिरोह को तो तुमने झुठलाया और एक गिरोह को कत्ल करते रहे ।

88. वे कहते है हमारे दिलों पर तो प्राकृतिक आवरण चढ़े है । नहीं, बल्कि नके इनकार के कारण अळ्लाह ने उन पर लानत की है, अतः वे ईमान थोड़े ही लाएँगे ।

89. और जब उनके पास एक किताब अल्लाह की ओर से आई है जो उसकी पुष्टि करती है जो उनके पास मौजूद है - और इससे पहले तो वे ना मानने वाले लोगों पर विजय पाने के इच्छुक रहे है - फिर जब वह चीज उनके पास गई जिस वे पहचान भी गए है, तो उसका इनकार कर बैठे, तो अल्लाह की फिटकार इनकार करने वालों पर ।

90. क्या ही बुरी चीज है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों का सौदा किया, अर्थात् जो कुछ अल्लाह ने उताहा है उसे सरकशी और इस अप्रियता का कारण नहीं मानते कि अल्लाह अपना फज्ल (कृपा) अपने बन्दों में से जिस पर चाहता है क्यों उतारता है, अतः वे प्रकोप पर प्रकोप के अधिकारी हो गए है र ऐसे इनकार करने वालों के लिये अपमानजनक यातना है ।